सुकुन  

मंगलवार, 7 सितंबर 2010





मिले सुकूं कहीं ऐसी कोई बात हो,
मै हूँ तनहा और मेरे जज़्बात हो,
हुए महफ़िल से मायूश बहुत हम आज,
डशे ख़ामोशी, काश ऐसी कोई रात हो.................
                                                                           - राज 

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गुज़रेंगे  

बुधवार, 12 मई 2010



हुई मोहब्बत सुन बेरहम तुझसे,
के आशिकी मे तेरी सुरत-ए-हाल गुज़रेंगे,
मुश्किल हुए अब दिनो को काटना,
के जाने कैसे अब ये साल गुज़रेंगे ।

कबसे खडे है दीदार को तेरे,
लोग कहते है मेरे यार गुज़रेंगे,
दो झलक मिले तो सुकुन आये दिल को,
जाने अब कब ये मौसम-ए-बहार गुज़रेंगे ।

हुई मुददत के अब न रहा इंतज़ार बाकि,
तेरे दर से अबकी ऐ गद्दार गुज़रेंगे,
तुझसे मिलने की चाह में मौत से मिल बैठे,
हम अबकी मैयत पे सवार गुज़रेंगे .....................


                                                                       - राज

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याददाश  

शुक्रवार, 16 अप्रैल 2010

उनके इश्क में ऐसा उलझे काम-तमाम भूल गए,
उनके इशारे छोड़ बाकी सब के सलाम भूल गए


सुन के उनकी बातें खुद के कलाम भूल गए,
खो के उनकी जुल्फों में कल की शाम भूल गए


उनकी आँखों से पीने में सारे जाम भूल गए,
पूजा उनको इतना अब तो अल्लाह-राम भूल गए


उनकी मोहब्बत के सिवा सारे इलज़ाम भूल गए,
उनको इतना सोचा की खुद का नाम भूल गए 



इतनी रहमत कर खुदा उनके जनाज़े के साथ मेरी लाश चली जाये,
याद रहे बस वो मौला बाकी याददाश चली जाये...........................राज 


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माई नेम इज "ठाकरे"  

गुरुवार, 11 फ़रवरी 2010

इन दिनों बॉम्बे में , माफ़ कीजियेगा मुंबई में माय नेम इज खान के बारे में सुन कर मैंने कल्पना की के अगर यही फिल्म शिवसेना कैंप बनाती तो इस फिल्म का टाइटल होता " माई नेम इज ठाकरे " जाहिर सी बात है फिल्म के हीरो बाल ठाकरे और उद्धव ठाकरे ही होंगे और विलेन शाहरुख़ खान को ही बनायेंगे, हालाकि शाहरुख़ खान को तो वो लोग अफ्फोर्ड नहीं कर सकते लेकिन उनके duplicate को तो कर सकते है. और इस फिल्म को डिरेक्ट करन जोहर की जगह महेश मांजरेकर करते जो की बाल ठाकरे के बहुत बड़े चेले है, जो की इस फिल्म को मराठी मै ही बनाते. लेकिन मुश्किल बात ये होगी की मराठी में बनी फिल्म कौन देखने आयेगा, चलो एक बार ये मान भी लेते है की कम से कम बॉम्बे में रहने वाले मराठी मानुस ही देखते लेकिन जब उनको पता चलेगा की फिल्म महेश मंजेरेकर ने डिरेक्ट की है तो वो भी नहीं आएंगे और सिर्फ उनके आने से तो फिल्म की लागत भी नहीं निकलेगी मुनाफा तो दूर की कौड़ी है, हां शिवसेना एक काम कर सकती है मुंबई में रहने वाले उत्तर भारतीयों को उनके घरो से मार-मार के सिनेमा घरो तक लाएगी और उनसे जबरदस्ती टिकेट खरीदने और फिल्म देखने पर मजबूर करेगी और ये हरकत वो तब तक करेगी जब तक वो लोग बॉम्बे नहीं छोड़ के जायेंगे और मेरा यकीन मानिये जितने परेशान उत्तर भारतीय शिव सेना की गुंडा गर्दी से नहीं हुए होंगे उससे कही ज्यादा परेशान वो इस फिल्म को देख के हो जायेंगे, हो सकता है कुछ लोग अपना मानसिक संतुलन भी खो दे, क्यूंकि मानसिक तौर पर बीमार लोगो के जरिये बनायीं फिल्म देखने से यही होगा , और शिव सेना के आन्दोलन से वो भले ही बॉम्बे न छोड़े लेकिन शिव सेना कैंप और महेश मांजरेकर की फिल्म के डर से जरूर छोड़ देंगे.

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