कुछ कंकर और मिट्टी  

शनिवार, 16 जुलाई 2016

आज भी मेरी जेबो मे कुछ कंकर और मिट्टी है,
अलमारी के कोनो मे रखी जैसे कुछ चिट्ठी है,
कुछ तेरे खत है, कुछ मेरे खत है, और कुछ खत हम दोनो के,
बन गए है हिस्से जैसे, अलमारी के कोनो के,
और पडी है एक डायरी मेरी, कुछ खाली पन्नो के साथ,
जज़्बातो की कमी नही, पर रह गया मै खाली हाथ,
कुछ पत्ती और फूल भी, हिस्से हो गए डायरी के,
बन के टुकडे पडे हुए है, अब भी मेरी शायरी के,
उल्झी हुई सी कुछ ज़िन्दगी मानो उसमे लिप्टी है,
आज भी मेरी जेबो मे कुछ कंकर और मिट्टी है । 
                                      - राज 

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